Wednesday, May 9, 2012

इश्क


कभी वो दूर जाते हैं हमसे दोस्तों,
और कभी पास आते हैं बेक़रार |
रातें कटती नहीं हैं उनकी  अब,
और इश्क से करते हैं इनकार |

गर्म साँसों में देखी तड़प बेहिसाब,
आगे जाकर, लौटते देखा है यार |
कातिल अंदाज़-ए- बयां है उनका, 
प्यार से कांपते वो होठ बेशुमार |

सुर्ख लवों पे कायनात लेकर आये,
गाल उनके शर्म से हो गए बेज़ार |
संभाल न सके वो खुद को सामने , 
मेरी बाँहों में गिरे सलीके से यार|

 @ सतीश गंगवार 

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