Sunday, September 5, 2010

याद

आयी थी जिनकी याद
चली भी गयी उन्हीं की याद में,
गाते रहे नगमेहम उनके तस्स्बुर में,
टकराते रहे जाम खालीउन्हीं की याद में,

साँसों की गर्माहट के लिए इतना मत तरसा,
कभी तो आएगी मेरी परछाई तेरे ही ख्याब में,
मैं दीवाना तेरी सांस की गर्मी में ही जीता हूँ,
मय ख़त्म हुई, अब तू उतर भी आ पैमाने में,

(सतीश गंगवार, १८-०८-१०)

गाँव की शिक्षा

शिक्षा रो रही है,
अपना मान खो रही है,
जिनके लिए है बनी,
उन्हीं के हाथों मर रही है,
कौन क्या कर रहा, हैं सब जानते,
मगर कुछ करना नहीं चाहते,

माँ बाप,
बच्चे को खाना खाने भेजते हैं,
बाद में फिर वजीफ़ा लेने जाते हैं,
पढ़ाई के लिए न आवाज़ उठाते,
पूरे दिन रहें चाहे गप्प लड़ाते,

पंचायतें,
अच्छा राशन बेंच कमाएं पैसा,
पोषण के नाम खाना कचरे सा,
जिनके जिम्मे दे दी ये शिक्षा,
नोच लिया सब गूदा इसका,
सिर पर बैठ के ये दिखाएँ ठेंगा,
कौन बोले, नहीं तो होगा पंगा,

गुरु जी
मास्टर जी की भी हालत है ख़राब,
स्कूल में करते अपनी खेती की बात,
दूसरे की धरती कर रहे ये बर्बाद, सोचें,
खुद के खेत में कौन सी लगायें खाद,
जिसका बस चलता वो सेटिंग बैठता,
अपने जगह किसी और से है पढवाता,

शिक्षा अधिकारी
दफ्तर में बैठे ले रहे शिक्षा के प्राण,
क्या करते, नहीं इनका कोई हिसाब,
इधर उधर की सब करें कारवाही,
नहीं चलाते ढंग का कोई बाण,

सरकार और शिक्षक
मीटिंग और ट्रेनिंग ही करवाएं,
कितने नक़्शे, जानकारी भरवाएं,
चुनाव में भेजें, पोलियो में लगायें,
देश में कुछ भी गिनना हो,
फ़ौरन गणना में लगवाएं,
उफ़ शिक्षकों से,
ये क्या क्या न करवाएं,

(सतीश गंगवार, १३-०६-१०)

स्त्री की बेड़ियाँ

सदियों से सजाती रही है औरत,
पुरुषों की दासता के ठप्पे,
मांग में सिन्दूर, पाँव में बिछुया,
और हाथों में चूड़ी रूपी ऐ बेड़ियाँ,
यही है शादी शुदा स्त्री की पहचान,
घर के बाहर या भीतर भी
उसे ये बेड़ियाँ पहनकर ही घूमना है,

स्त्री को देखते अनायाश ही,
पुरुष क्यों ढूंढ़ता है स्त्री के,
हाथ, पैरों में बेड़ियाँ और मांग में सिन्दूर, 
अगर ये सब है तो, शायद कुछ छोड़ दें घूरना,
ये सोचकर कि भोगी हुई वस्तु है,
किसी के खूंटे से बंधी हुई वस्तु है,
नहीं तो माल कि तरह पड़ती है उनकी नज़र,
ये हैं लड़की के शादी शुदा होने की मुहर,

पति के मरने के बाद उसे भी ,
सफ़ेद कफ़न में लपेटा जाता है
एक और नयी पहचान देने के लिए ,
इन बेड़ियों में है उनकी आन बान शान ,
औरत ही है इन बेड़ियों को ढोने के लिए ?

खुद पे कोई मोहर नहीं लगाई ,
जिंदगी भर रहे स्वछन्द और ,
बाँध दिया औरतो को बेड़ियों में खूंटे से ,
पैरों में पायल, बिछुए, नाक में नाथ,
हाथों में चूड़ियाँ और मांग में सिन्दूर के लिए ,
क्या सिर्फ यही पहचान रह गयी है औरत की ?

कब दोगे उसे एक स्वतंत्र असितत्व ?
कब मानोगे आखिर वह भी, तुम्हारी तरह इंसान है ?
उसे भी तुम्हारी तरह, स्वतंत्रता से जीने का हक़ है ?

** सतीश गंगवार ** (२९-०४-१०, समय-८:०२)

बिना पूंछ वाले

तासीर आदमी कीकि उसे देखकर आदमी ही डरने लगे ,
विश्वाश पी लिया, ईमान खा लिया, अब आदमी खाने लगे ,
सोच के बनाना रिश्ते, बिना पूंछ वाले प्राणी से अब डर लगे ,
महसूस करता हूँ कि मोगली कि तरह ही जाऊं जंगलों में .
और दोस्त बना लूँ भालू, हाथी और उछलते सह्रदय हिरने ,
यहाँ तो हैं अभी कुछ ही इंसान, ज्यादा हैं बिना पूंछ लगे ,
 ** सतीश गंगवार ** (समय-०१:०७, दिनांक-२४-०४-10)

शुष्क धरती

पानी की एक बूंद ही काफी है,
शुष्क धरती की प्यास बुझाने को ,
प्यार भरी एक मुस्कराहट ही काफी है,
किसी की जिंदगी बसाने को,

पानी की एक बूंद ही काफी है,
जीवन मोती बनाती है सीप को,
उसे खुद को एक कण ही काफी है, 
मरे जो  हर पल धरा बचाने को,

जीते जो हर क्षण सडको पर नंगे भूखे, उनको,
दो जून की रोटी ही काफी है जिन्दा रहने को,
उनका तो एक पल जीना ही  काफी है!
हर पल मरते  हैं जो, औरों को जिन्दा रखने को,

एक 'चीर' ही काफी है, 
उजड़ रही है मानवता बचाने को, 

** सतीश गंगवार ** (१०-०३-२०१०)