ओस की बूंदों ने कह दिया, कि कोई अब उन्हें चूम ले,
झूमना है जिसको जितना भी, उनके साथ आज झूम ले,
वो बेबफा भी नहीं बनते, और बफा भी नहीं करते हैं,
हर धड़कन में हैं,फिर भी हाल-ए-नब्ज़ नहीं समझते हैं,
दिल नहीं लगता उनका, अब किसी और के इंतज़ार में,
महफ़िल कैसे सजाएँ हम, बिन साकी के इस बाज़ार में,
हम चाँद देखने को बैठे रहे रातभर, नज़रें लगाए आसमाँ में,
वो हुस्न छुपाते रहे खूब, काली घटाओं की बेहया चादरों में,
चांदनी भी कहने लगी, अब सो जाओ दीवाने अपने ख्याब में,
वो न समझेंगे तुम्हारी दिलकशी, अपनी खुमारी के नशे में,
(सतीश गंगवार, १८-०९-१०)