Saturday, March 26, 2011

मुश्किल है उलझे मन को सुलझाना,
जैसे बिखरे आयने को फिर बनाना,
दोस्त बनते है कई,ख़ालिस जिंदगी में,
मुश्किल है दोस्ती में विश्वास निभाना,

(सतीश गंगवार, 22-02-2011)







कहाँ जाएँ इस जहां में कही न शुकून आता है,
हमें देखकर मयखाने में जाम भी रूठ जाता है,
सूरत अपनी देखने के लिए, एक हमदर्द था,
अब शीशा भी देखते ही मेरा चेहरा, टूट जाता है,


सतीश गंगवार

अज़ीज़ पत्थर





कोई दूर है बहुत मुझसे, फिर भी उसका हर रंग है करीब मेरे !
सिकुड़ जाएँ ये रास्ते तो क्या, पत्थर भी बहुत अज़ीज़ हैं मेरे !


(सतीश गंगवार, २६-०३-२०११)

खाली घड़ा




रूठकर गर कोई चला जाता है,
घर मेरा खाली घड़ा हो जाता है,
मेरा दिल हर चोट सह लेता है,
दिल पत्थर उनका ही टूट जाता है.
'सतीश गंगवार'