उड़ने की चाह
Thursday, July 21, 2011
बनाकर कागज की कस्तियाँ वो कहते हैं कि दरिया पार ले जायेगे
कौन समझाए उन्हें हम रोज़ ही बिन कस्ती के दरिया पार करते हैं,
(सतीश गंगवार, १६-०७-२०११)
मंहगाई का पेट्रोल
बिखरे जो तूफ़ान में, मरे हैं जो विस्फोटों में,
आत्मा की शांति के लिए मोमबती जलती है,
जी जी कर जो हर रोज़ मरते हैं, उनके लिए
सरकार रोज़ मंहगाई का पेट्रोल छिड़कती है,
(सतीश गंगवार, १६-०७-२०११)
झोपड़ी
कभी जीकर देखो, जीवन झोपड़ी का ,
क्या मुशिकल और मज़ा है झोपडी का,
क्या चाल और नीति जाल है, झोपड़ी का,
कैसा जीवन रंग और मानव है, झोपड़ी का,
क्या होगा चढ़ती महगाई में,अब झोपड़ी का,
महल बनेगे क्या, अब फिर उसके सीने पर,
नीति जाल में उलझेगा, कंकाल झोपड़ी का,
कौन बनेगा तारणहार, अधमरी झोपड़ी का,
(सतीश गंगवार, १९-०७-२०११, प्रातः ७:३० बजे)
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