Friday, July 1, 2011
चोर
चोरों की कमी नहीं इस दुनिया में,
उलट पुलट करते हैं हर वो काम,
फिर केवल नेताओं को ही गली देते,
हो चाहे फिर खुद भी सबसे बदनाम,
(सतीश गंगवार ०१-०७-२०११, प्रातः ६:४९ ए.एम.)
मिश्रण
बिछुड़ने वालों से पूंछो, मिलने की आस क्या होती है,
तपते हुए खेतों से कोई पूंछे, कि प्यास क्या होती है,
बरसते नैनों से पूंछे, कोई दिल की आग क्या होती है,
जलते परवानों से पूंछो, शमां की चाह क्या होती है ,
तपते हुए खेतों से कोई पूंछे, कि प्यास क्या होती है,
बरसते नैनों से पूंछे, कोई दिल की आग क्या होती है,
जलते परवानों से पूंछो, शमां की चाह क्या होती है ,
परेशाँ होकर मुसाफिर तुझे क्या मिलेगा,
चलते जाना है तुझे हर तूफ़ान से लड़कर,
कोई तो हमसफर मिलेगा,
रिश्ते बनते हैं पल पल आग से तपकर.
कुछ लोग तो मिटा देते, यूँ ही हँसकर,
छू लेते हैं जो दिल की नस जो कसकर,
ज़ज्बात क्या समझेंगे, बनेगे वो नश्तर ,
ज़ज्बात क्या समझेंगे, बनेगे वो नश्तर ,
(सतीश गंगवार, ३०.०६.२०११, रात्री ९:३० पी.एम.)
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