कभी दरख़्त बन के गिरे ये आँसू,
कभी बिन बरसात सैलाब बन गए,
हम यादों का समंदर लिए फिरते हैं,
और वो चेहरा छुपा के निकल गए,
जीतना आदत थी हमारी, जिंदगी में,
उन्हें पाने की ख्वाहिश में ही हारते गए,
पुतले बने खुद के, कभी परछाईं उनकी,
वो साये को भी यूँ कुचल के चले गए,
सतीश गंगवार (12-11-2013)
कभी बिन बरसात सैलाब बन गए,
हम यादों का समंदर लिए फिरते हैं,
और वो चेहरा छुपा के निकल गए,
जीतना आदत थी हमारी, जिंदगी में,
उन्हें पाने की ख्वाहिश में ही हारते गए,
पुतले बने खुद के, कभी परछाईं उनकी,
वो साये को भी यूँ कुचल के चले गए,
सतीश गंगवार (12-11-2013)
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