Sunday, November 24, 2013

इश्क़ की मोमबत्तियाँ



ये बारिस और गुलाबी सर्दियाँ, तकरार और शोख़ मुस्कियाँ,
कमसिन शरारतें उसकी, दे गयीं नशीली यादों की तन्हाईयाँ,

कोई भी पढ़ सकता है, उसके चेहरे पर चाहत की परछाईयाँ,
ढूंढ लो चिराग से न मिलेगा ऐसा चेहरा और वो मासूमियाँ, 

कमब्खत दिल भी पढ़ लेता है, उन होठों की अनबोली बोलियाँ,
'चन्द्र' रौशनी हो रही देखिए, बिन जलाए इश्क़ की मोमबत्तियाँ,

सतीश गंगवार

आँसू

कभी दरख़्त बन के गिरे ये आँसू,
कभी बिन बरसात सैलाब बन गए,
हम यादों का समंदर लिए फिरते हैं,
और वो चेहरा छुपा के निकल गए,

जीतना आदत थी हमारी, जिंदगी में,
उन्हें पाने की ख्वाहिश में ही हारते गए,
पुतले बने खुद के, कभी परछाईं उनकी,
वो साये को भी यूँ कुचल के चले गए,

सतीश गंगवार (12-11-2013)