Saturday, October 2, 2010

निगाह-ए-जाम

यादों से वो, सर्द मौसम गरम कर जाते हैं,
निगाह-ए-जाम से, रातें मदहोश कर जाते हैं,


हम कहें न कहें कुछ भी, अपनी जुबां से,
मगर वो, बातें सरे आम बेबाक कर जाते है,

(सतीश गंगवार, ०२-१०-२०१०)

Saturday, September 18, 2010

हाल-ए-नब्ज़

ओस की बूंदों ने कह दिया, कि  कोई अब उन्हें चूम ले,
झूमना है जिसको जितना भी, उनके साथ आज झूम ले,


वो बेबफा भी नहीं बनते, और बफा भी नहीं करते हैं,
हर धड़कन में हैं,फिर भी हाल-ए-नब्ज़ नहीं समझते हैं,


दिल नहीं लगता उनका, अब किसी और के इंतज़ार में,
महफ़िल कैसे सजाएँ हम, बिन साकी के इस बाज़ार में,

हम चाँद देखने को बैठे रहे रातभर, नज़रें लगाए आसमाँ में,
वो   हुस्न छुपाते रहे खूब, काली घटाओं की  बेहया चादरों में,

चांदनी भी कहने लगी, अब सो जाओ दीवाने अपने ख्याब में, 
वो न समझेंगे तुम्हारी दिलकशी, अपनी खुमारी के नशे में,  

(सतीश गंगवार, १८-०९-१०)

Friday, September 17, 2010

मदहोश

तमन्ना थी कि उनके आगोश में शाम हो जाए,
जिंदगी कि हर एक बात,अब सरे आम हो जाए,

अरमां था दिल में, कि उसके घर में ही शाम हो जाए,
समझ ले वो मेरे हालात, फिर एक-एक जाम हो जाए,

महफ़िल में तुम रहो न रहो, तुम्हारी खुशबु ही आ जाए,
एक सांस लेकर उस खुशबू की, दीवाना मदहोश  हो जाए,  

एक आरज़ू थी कि मरने से पहले तेरा दीदार हो जाए,
कह दो अब जहां से, कि मोहब्बत का असर देख जाए,


कभी फिर न कहे कोई, कि मझधार में ही शाम हो जाए,   
हर पत्थर को रंग दे इश्क में, कि रास्ता आसान हो जाए,

(सतीश गंगवार, १७-०९-१०)

Thursday, September 16, 2010

परछाई

परछाई ढूढने निकले हम, मुर्दों के शहर में,
अदब अपना ढूढने निकले, दोस्तों के कहर में,

भूल गए मुर्दों की तो, कोई परछाई नहीं होती,
इश्क के गम डूबे हुए की, रुबाई ख़त्म नहीं होती,

कभी तो अपनी सांसें ही, इश्क के दरिया में नाव नहीं बनती,
खो जाएँ ख्याब कही, फिर तस्वीर तेरी, मेरी जान नहीं बनती,

छोड़ दें हौसला हम,फिर कोई नई चीन की दीवार नहीं बनती,
कितना भी मचलें अरमान, फिर निकलने की राह नहीं बनती,

(सतीश गंगवार, १६-०९-१०)

Friday, September 10, 2010

तमन्ना


तमन्ना थी कि, उनके आगोश मे ही शाम हो जाए,
खुश हूँ कि उसने, मेरे लिए बिछाए हैं संगीनों के साए, 

जब भी वो गिरे,
गस खाकर, हम दौड़े चले आए,


लहराई तलवार कलेजे पर, तो और मुस्कराए,

बसर करता था रात ये सोचकर, कि निकलते ही सूरज ढल जाए,  
ठहर न जाएँ पैमाने कहीं, 
उससे पहले ही मिलने कि शै आ जाए,



कौन कमबख्त चाहता है, बाँहों के घेरे से निकलना, 
चाहता हूँ हर वक़्त, तेरी शमशीर पर ही  मचलना, 

एक ही मुराद 
है बस, 
तेरी सांस की डोरिओं में उलझना,

कोई समंदर नहीं, तेरे गेशुओं के साए में उम्र भर तैरना,

(सतीश गंगवार, १०-०९-१०)