Friday, September 17, 2010

मदहोश

तमन्ना थी कि उनके आगोश में शाम हो जाए,
जिंदगी कि हर एक बात,अब सरे आम हो जाए,

अरमां था दिल में, कि उसके घर में ही शाम हो जाए,
समझ ले वो मेरे हालात, फिर एक-एक जाम हो जाए,

महफ़िल में तुम रहो न रहो, तुम्हारी खुशबु ही आ जाए,
एक सांस लेकर उस खुशबू की, दीवाना मदहोश  हो जाए,  

एक आरज़ू थी कि मरने से पहले तेरा दीदार हो जाए,
कह दो अब जहां से, कि मोहब्बत का असर देख जाए,


कभी फिर न कहे कोई, कि मझधार में ही शाम हो जाए,   
हर पत्थर को रंग दे इश्क में, कि रास्ता आसान हो जाए,

(सतीश गंगवार, १७-०९-१०)

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