Sunday, April 17, 2011

गुलाबी ओढ़नी

सुहाने मौसम को, और भी सुहाना बना दो,
आज इस जहां को, गुलाबी ओढ़नी उढ़ा  दो,

धुंधली दीवारें हर घर की, अब रेशमी बना दो,
अँधेरे को भी पाने वो, सुनहरे भाव पहना दो,

धरती के कण, बादलों की हर बूंद में समा दो,
जो भी तुम चाहते हो, वही इस जहां को बना दो,

मगर अपने तरक्की में, न कोई  आह उठने दो,
करना है अगर कुछ, तो बिखरे ये तार जोड़ दो,

सुहाने मौसम को, और भी सुहाना बना दो,
आज इस जहां को, गुलाबी ओढ़नी उढ़ा दो,


सतीश गंगवार

चिलचिलाती धूप

बादलों को चीरती धूप ने जब चेहरे को जलाया,
हसीं उनकी जुल्फों ने तब,  मुझे जलन से बचाया,

बादल सोचकर चले कि ठंडा करें धरती का कलेजा,
मगर सूरज ने भी फिर  तपिश का परचम लहराया,

दोनों की दुश्मनी ने कई कई बार ज़मीन को रुलाया,
पानी ताकते नवजात पौधों को सूरज ने झुलसाया,


सतीश गंगवार