उड़ने की चाह
Monday, September 6, 2010
सुहानी सुबह
ढल जाए रात आज तो बुलाना मत,
सोयी इन पलकों को तुम जगाना मत|
भोर होने तक का मज़ा लेने देना इन्हें,
सुहानी सुबह के तजुर्बे से रोकना मत |
(सतीश गंगवार, ०३-०९-१०)
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