आयी थी जिनकी याद,
चली भी गयी उन्हीं की याद में,
गाते रहे नगमे, हम उनके तस्स्बुर में,
टकराते रहे जाम खाली, उन्हीं की याद में,
साँसों की गर्माहट के लिए इतना मत तरसा,
कभी तो आएगी मेरी परछाई तेरे ही ख्याब में,
मैं दीवाना तेरी सांस की गर्मी में ही जीता हूँ,
मय ख़त्म हुई, अब तू उतर भी आ पैमाने में,
(सतीश गंगवार, १८-०८-१०)
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