Sunday, September 5, 2010

याद

आयी थी जिनकी याद
चली भी गयी उन्हीं की याद में,
गाते रहे नगमेहम उनके तस्स्बुर में,
टकराते रहे जाम खालीउन्हीं की याद में,

साँसों की गर्माहट के लिए इतना मत तरसा,
कभी तो आएगी मेरी परछाई तेरे ही ख्याब में,
मैं दीवाना तेरी सांस की गर्मी में ही जीता हूँ,
मय ख़त्म हुई, अब तू उतर भी आ पैमाने में,

(सतीश गंगवार, १८-०८-१०)

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