आज कोई क्यूकर बहुत याद आने लगा है,
मेरी सांसे भी वो यूँ ही क्यों चुराने लगा है !
शबाब उसका मेरी नज़रों में बिखरने लगा है,
मैं बदरंग, मगर रंग उसका निखारने लगा है !
मेरी सांसे भी वो यूँ ही क्यों चुराने लगा है !
शबाब उसका मेरी नज़रों में बिखरने लगा है,
मैं बदरंग, मगर रंग उसका निखारने लगा है !
© सतीश गंगवार
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