Friday, April 27, 2012

झोपड़ी

कभी जीकर देखो, जीवन झोपड़ी का ,
क्या मुशिकल और मज़ा है झोपडी का,

क्या चाल और नीति जाल है, झोपड़ी का,
कैसा जीवन रंग और मानव है, झोपड़ी का,

क्या होगा चढ़ती महगाई में,अब झोपड़ी का,
महल बनेगे क्या, अब फिर उसके सीने पर,

नीति जाल में उलझेगा, कंकाल झोपड़ी का,
कौन बनेगा तारणहार, अधमरी झोपड़ी का, 




© सतीश गंगवार, १९-०७-२०११, प्रातः ७:३० बजे---->>

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