Thursday, May 10, 2012

पहरेदार

ठहर जाएँ वो एक तमन्ना बनकर,
रूठ जाएँ कभी यूँ हमराज़ बनकर,
सो जाएँ बस्तियां अँधेरी रातों में,
'चन्द्र' जागते हैं पहरेदार बनकर,

@सतीश गंगवार

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