Saturday, April 28, 2012

वो रूठे हैं आज हमसे प्यार कि खातिर ,
नहीं जानते कि गुस्से में प्यार बढ़ता है,
©---->>>> सतीश गंगवार

Friday, April 27, 2012

झोपड़ी

कभी जीकर देखो, जीवन झोपड़ी का ,
क्या मुशिकल और मज़ा है झोपडी का,

क्या चाल और नीति जाल है, झोपड़ी का,
कैसा जीवन रंग और मानव है, झोपड़ी का,

क्या होगा चढ़ती महगाई में,अब झोपड़ी का,
महल बनेगे क्या, अब फिर उसके सीने पर,

नीति जाल में उलझेगा, कंकाल झोपड़ी का,
कौन बनेगा तारणहार, अधमरी झोपड़ी का, 




© सतीश गंगवार, १९-०७-२०११, प्रातः ७:३० बजे---->>

बदरंग

आज कोई क्यूकर बहुत याद आने लगा है, 
मेरी सांसे भी वो यूँ ही क्यों चुराने लगा है ! 
शबाब उसका मेरी नज़रों में बिखरने लगा है,
मैं बदरंग, मगर रंग उसका निखारने लगा है ! 




© सतीश गंगवार  
कभी नशे में चेहरा दिखता है ,
कभी चेहरे से ही नशा होता है !
कुछ तो कशिश है उस चेहरे में,
याद करूँ तो भी नशा होता है!



© सतीश गंगवार
वो पिलाते हैं जो ज़ाम तो नशा और होता है,
साकी के हाथ मज़ा कहाँ आता है अब पीने में 



© सतीश गंगवार
बदलना तो फितरत है आदमी की ,
जनावर होता तो शायद और बात होती, 


© सतीश गंगवार
जब कभी उसने वो गीत गुनगुनाया होगा,
बेवजह नहीं, कोई तो याद आया ही होगा, 
आज हवायों ने किया है रुख, मेरे घर का, 
ज़रूर उसने कोई पैगाम भिजवाया होगा,



©सतीश गंगवार
तुझे जब भी देखूं नयी नज़्म बनने लगती है,
कोई तरतीब अल्फाजों की सजने लगती है,



© सतीश गंगवार 
मैं कभी कह भी दूँ अगर कुछ तेरी ज़ानिब,
डरता हूँ सैलाब न आ जाए तेरी निगाहों में, 

© सतीश गंगवार
ये कब कहा मैंने तू मेरे साथ ही रह,
मगर मैं तेरे बिना रह नहीं सकता, 
कुछ भी हो अंजाम इस ज़माने में, 
तुझे दिल से कभी खो नहीं सकता,


© सतीश गंगवार
तेरी यादों ने ही सिखाया है, मुझे दिन रात गिनना,
वर्ना कब के भूल जाते हम तो साँसों की गिनती भी, 


©  *****सतीश गंगवार*****

तेरे साथ



तेरे साथ हूँ तो कल्पनायों का कोई छोर नहीं होता,
कुछ भी मुश्किल हो दिल कभी कमजोर नहीं होता, 

भले ही पीर, पर्वत सी खड़ी हो मेरे सामने, ज़ालिम,
तेरी यादों का सिलसिला कभी महसूस नहीं होने देता, 

©----------सतीश गंगवार----------- 

Wednesday, April 18, 2012

सांसों की मेहरबानी

मेरी सांसों की मेहरबानी भी मुझ पर ,
अब तेरी शोख़ मुस्कराहटों से ही होती है,
क्या कहूँ कैसे जीता हूँ हर लम्हा ज़ालिम, 
ख़ून में रवानी अब तेरे दीदार से ही होती है, 


-----सतीश गंगवार------

Sunday, April 8, 2012

पढ़े लिखे


पढ़े लिखे होशियार बहुत होते हैं,
रटे हुए भाषण इनके तैयार होते हैं!

मंच पर कुछ भी बोल सकते हैं ये,
उसके बाद भूलने को तैयार होते हैं!

सारे सिद्धांत, नियम याद रखते हैं,
कभी भी बदलने को तैयार रहते हैं!

जैसे इनके घर के खेती हो, हरवक्त,
छोटों का दम घोटने को तैयार होते हैं!

हम सबसे अच्छे, ये भ्रम रहता इनको,
अपने उपदेश देने को तैयार होते हैं!

छोटी बात लगती, बड़ी हिमालय से,
बड़ी बात को सड़ाने को तैयार होते हैं!

सही सीख और अच्छी शिक्षा देते हैं,
पर खुद उसका उल्टा शोषण करते हैं!

संभल के , इनके चक्कर में न आना,
किसी अनपढ़ से उपदेश ले लेना तुम!

कभी सच कहने कि कोशिस न करना,
शहद से कुचलने को तैयार होते हैं ये !

कभी मास्टर जी ने नहीं पढाया ये सब
फिर कैसे ये पढ़े लिखे तैयार होते हैं..!

(सतीश गंगवार, १७-०३-२०१२)