Friday, May 18, 2012

सोचा न था


मिलेगे वीराने में इस तरह हमने कभी सोचा न था,
टूटेंगे ख्याब रेत के मकान की तरह ये सोचा न था,

इश्क  में सुलगते दिल में धुंआ न हो, सोचा न था, 
अश्कों की बारिस में दिल न भीगे, ये सोचा न था, 

साँसों में बसाने वाले बदल जायेंगे ये सोचा न था,
धडकनों में रहने वाले ही, छीन लेंगे ये सोचा न था, 

खुद कत्ल करते तो ख़ुशी होती, उनके पोरों की छुअन से,
दुश्मनों से मिलके टुकड़े करेगे, हमने कभी ये सोचा न था,

@सतीश गंगवार 

Thursday, May 17, 2012

कफ़न का सामान

उदास मत हो इस तरह कि मेरा दम निकल जाए,
हर चमन तेरे मुस्कराने का ही इंतज़ार करता है...! 

गम नहीं इंतज़ार में कोई खूबसूरत शै निकल जाए,
शमां के जलने का, परवाना यूँ  इंतज़ार करता है..!

कोई गम नहीं जिंदगी, शाख से टूटा पत्ता  बन जाए, 
कली के शबाब में भमरा इस कदर मदहोश रहता है..!

किसी के जाने से कब मेरी आँखों को रोना आ जाए,
दिल अब मेरा रोज़ रोते हुए सोने को तैयार रहता है..! 

ख़ुशी के पल का इंतज़ार करते भले ही मौत आ जाए,
'चन्द्र' हरदम अपने कफ़न का सामान साथ रखता है..!

@ सतीश गंगवार 

Friday, May 11, 2012

टूटती सांस

गुज़र गए वो बादल भी जो बरसने थे मेरी जिंदगी में,
आंधियाँ भी रुख नहीं करती हैं अब मेरे गाँव का.....!

दिल ने ना धडकने का इरादा भी कर लिया है अब,
और आंसू भी साथ नहीं देते हैं इन सूखी आँखों का....!

कोई भी रास्ता नहीं जिसमे मैं चला न हूँ इस जहां में, 
कदम भी साथ छोड़ने लगे हैं अब मेरी जिंदगी का....!

पलकें भी झपकती नहीं अब इन दीवारों के पिंजरे में,
कसकता है जिन्दा रहना अब हाल है ये जिंदगी का..!

ये जिंदगी भी बड़ी बेअसूल हो गयी, मेरी मोहब्बत में,
'चन्द्र' हम तो साथ देंगें, उनकी टूटती  हर सांस का...!  


@सतीश गंगवार 



Thursday, May 10, 2012

पहरेदार

ठहर जाएँ वो एक तमन्ना बनकर,
रूठ जाएँ कभी यूँ हमराज़ बनकर,
सो जाएँ बस्तियां अँधेरी रातों में,
'चन्द्र' जागते हैं पहरेदार बनकर,

@सतीश गंगवार

Wednesday, May 9, 2012

आखों से ओझल

आज वो अपनी हालत कुछ यूँ बयां कर गए,
देखकर उनकी अदाएं हम भी दंग रह गए, 
उम्मीदें जगाकर फिर हमारे दिल में वो,
मिले थे चौराहे पर, आखों से ओझल हो गए, 

@सतीश गंगवार

इश्क


कभी वो दूर जाते हैं हमसे दोस्तों,
और कभी पास आते हैं बेक़रार |
रातें कटती नहीं हैं उनकी  अब,
और इश्क से करते हैं इनकार |

गर्म साँसों में देखी तड़प बेहिसाब,
आगे जाकर, लौटते देखा है यार |
कातिल अंदाज़-ए- बयां है उनका, 
प्यार से कांपते वो होठ बेशुमार |

सुर्ख लवों पे कायनात लेकर आये,
गाल उनके शर्म से हो गए बेज़ार |
संभाल न सके वो खुद को सामने , 
मेरी बाँहों में गिरे सलीके से यार|

 @ सतीश गंगवार 

Saturday, May 5, 2012

मेरी हालत
























हर हद पार कर दी मैंने चाहत में, वो जानते हैं,
फिर भी मेरे दिल के ज़ज्बात वो कब समझेगे,
जिंदगी के हर इम्तिहान में पास होता आया हूँ, 
मगर, मोहब्बत में कितने और इम्तिहान देने होगे,

कोई क्या कहेगा इस बात से नहीं डरता हूँ मैं, 
इसका भी डर नहीं, कि वो मुझे क्या समझेंगे, 
मैं तो डरता हूँ शहीद परवानों की बददुयाओं से, 
उनकी बेबफाई पर मेरे प्यार को क्या समझेगे, 

छोड़ आया हूँ उनकी गली में, अपनी टूटी हुई साँसों को,
जीता हूँ बिना धडकनों के, इस बात को वो कब समझेगे, 
कर आया हूँ अपनी मोहब्बत की किस्से परिंदों के हवाले, 
रोये थे वो भी बहुत, मगर मेरी  हालत  वो कब समझेगे, 



सतीश गंगवार