शिक्षा रो रही है,
अपना मान खो रही है,
जिनके लिए है बनी,
उन्हीं के हाथों मर रही है,
कौन क्या कर रहा, हैं सब जानते,
मगर कुछ करना नहीं चाहते,
माँ बाप,
बच्चे को खाना खाने भेजते हैं,
बाद में फिर वजीफ़ा लेने जाते हैं,
पढ़ाई के लिए न आवाज़ उठाते,
पूरे दिन रहें चाहे गप्प लड़ाते,
पंचायतें,
अच्छा राशन बेंच कमाएं पैसा,
पोषण के नाम खाना कचरे सा,
जिनके जिम्मे दे दी ये शिक्षा,
नोच लिया सब गूदा इसका,
सिर पर बैठ के ये दिखाएँ ठेंगा,
कौन बोले, नहीं तो होगा पंगा,
गुरु जी
मास्टर जी की भी हालत है ख़राब,
स्कूल में करते अपनी खेती की बात,
दूसरे की धरती कर रहे ये बर्बाद, सोचें,
खुद के खेत में कौन सी लगायें खाद,
जिसका बस चलता वो सेटिंग बैठता,
अपने जगह किसी और से है पढवाता,
शिक्षा अधिकारी
दफ्तर में बैठे ले रहे शिक्षा के प्राण,
क्या करते, नहीं इनका कोई हिसाब,
इधर उधर की सब करें कारवाही,
नहीं चलाते ढंग का कोई बाण,
सरकार और शिक्षक
मीटिंग और ट्रेनिंग ही करवाएं,
कितने नक़्शे, जानकारी भरवाएं,
चुनाव में भेजें, पोलियो में लगायें,
देश में कुछ भी गिनना हो,
फ़ौरन गणना में लगवाएं,
उफ़ शिक्षकों से,
ये क्या क्या न करवाएं,
(सतीश गंगवार, १३-०६-१०)
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