हर रोज़ एक नयी तस्वीर बनाता हूँ !
खुबसूरत हैं खिलौने, जो मिट्टी के ढेर से बनाता हूँ !
मैं हूँ जो हर रोज़, खुद मिट्टी का ढेर बन जाता हूँ !
अपनी तकदीर को भी मिट्टी में ही मल देता हूँ!
कोई पूंछे दिल का हाल मिट्टी ही बता देता हूँ !
न कोई अरमां है अब, चाक मैं और तेज चला देता हूँ !
सारे सपने चाक की चाल में खो गए, जो देखता हूँ !
कुछ से कुछ बना तो लेता हूँ, पर खुद कुछ न बना हूँ !
ढूंढ़ता हूँ असर जिंदगी का मिट्टी में, न ढूंढ़ पाता हूँ !
आह भरते-भरते एक कलाकृति बन तो जाती है मगर !
जो बनना था मुझे वो, अब भी अधूरा ही रह जाता हूँ !
कितनी चीज़े गढ़ी हैं मैंने इसी मिट्टी से, याद आता है !
खुद को न गढ़ पाया जो दिल को हरदम कसकाता है !
मुझसे तो चाक भी तेज चलता है कोई गम नहीं करता है !
मुझमे जान क्यों है न मालूम, फिर भी क्यों बेजान रहता हूँ!
**सतीश गंगवार ** (२७-०४-१०, समय ११:४४)
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