Sunday, September 5, 2010

मिट्टी का ढेर

मैं बेकार मिट्टी से एक चीज़ बनाता हूँ ! 
हर रोज़ एक नयी तस्वीर बनाता हूँ !

      खुबसूरत हैं खिलौने, जो मिट्टी के ढेर से बनाता हूँ !
      मैं हूँ जो हर रोज़, खुद मिट्टी का ढेर बन जाता हूँ !

अपनी तकदीर को भी मिट्टी में ही मल देता हूँ!
कोई पूंछे दिल का हाल मिट्टी ही बता देता हूँ !

      न कोई अरमां है अब, चाक मैं और तेज चला देता हूँ !
      सारे सपने चाक की चाल में खो गए, जो देखता हूँ !

कुछ से कुछ बना तो लेता हूँ, पर खुद कुछ न बना हूँ !
ढूंढ़ता हूँ असर जिंदगी का मिट्टी में, न ढूंढ़ पाता हूँ !

      आह भरते-भरते एक कलाकृति बन तो जाती है मगर !
      जो बनना था मुझे वो, अब भी अधूरा ही रह जाता हूँ !

कितनी चीज़े गढ़ी हैं मैंने इसी मिट्टी से, याद आता है !
खुद को न गढ़ पाया जो दिल को हरदम कसकाता है !

      मुझसे तो चाक भी तेज चलता है कोई गम नहीं करता है !
      मुझमे जान क्यों है न मालूम, फिर भी क्यों बेजान रहता हूँ!

                 **सतीश गंगवार ** (२७-०४-१०, समय ११:४४)

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