थोडा वक़्त उन्हें भी दे दो, जो तुम्हारे पीछे खड़े हैं,
कमतर नहीं हैं वो, बस कोई अक्षमता से पिसे हैं,
ओज उनमें भी है हमारी तरह, एक दिशा को खड़े हैं,
संभावनाएं उनमे भी हैं बहुत, दो चार रोड़े राह में पड़े हैं,
संभावनाएं उनमे भी हैं बहुत, दो चार रोड़े राह में पड़े हैं,
ये रुकाबटें हटानी होगी हमें, वो भी इस राष्ट्र की नसे हैं,
कुछ करने की ललक है, वो अनकहा ख्याब लिए खड़े हैं,
दया की भीख नहीं मांगते हैं वो हमारी वजह से पिछड़े हैं,
बिखर जाएगी पंखुडियां फूलों की,अभी ताजा खिले हैं।
थोडा वक़्त उन्हें भी दे दो, जो तुम्हारे पीछे खड़े हैं,
** सतीश गंगवार **
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