Sunday, September 5, 2010

चरमराते रिश्ते

चरमराते रिश्तो की कराहट कोई तो सुन ले
आह भरती हवाओं से कोई तो बात कर ले,
         दरक न जाएँ उम्मीदों के घरौंदे इस बार,
         कोई इन उनींदी उम्मीदों को पंख लगा दे,
दहकती हूक को कोई दोस्त नम कर दे,
झुलस जायेंगे रिश्तेवर्ना इसकी तपिश में,
        तमाशबीन मिल जायेंगे बहुत, जहां में,
        कोई गिरते हुए कोआज सहारा दे दे,
बुनियाद इतनी कमजोर क्यों है आदमी की, बता दे,
मजबूत कर इसे कोई तोखूबसूरत इवारत बना दे,
        सांस से ही जीता हैऔर मर भी जाता है सांस से,
        कोई खिलाकर गुलअब इसमें नयी सांस तो भर दे,
                                 (सतीश गंगवार१७-०८-१०)

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