आह भरती हवाओं से कोई तो बात कर ले,
दरक न जाएँ उम्मीदों के घरौंदे इस बार,
कोई इन उनींदी उम्मीदों को पंख लगा दे,
दहकती हूक को कोई दोस्त नम कर दे,
झुलस जायेंगे रिश्ते, वर्ना इसकी तपिश में,
तमाशबीन मिल जायेंगे बहुत, जहां में,
कोई गिरते हुए को, आज सहारा दे दे,
बुनियाद इतनी कमजोर क्यों है आदमी की, बता दे,
मजबूत कर इसे कोई तो, खूबसूरत इवारत बना दे,
सांस से ही जीता है, और मर भी जाता है सांस से,
कोई खिलाकर गुल, अब इसमें नयी सांस तो भर दे,
(सतीश गंगवार, १७-०८-१०)
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