एक अलफ़ाज़ की कमी को बदसलूकी का नाम दिया,
सलीके के लिए,सलीके से जिन्होंने कभी न खोली जुबाँ,
इतना ही दर्द है अगर,उन्हें मुझसे एक लफ्ज़ छूट जाने का,
ज़माने में बदसलूकी के मेले क्यों लगने दिए हर मरतबा,
मेरे एक शब्द ने इतना क्या किया, कि उसे तीर समझा,
हर रोज़ चुभते हैं शब्दतीर गैरों के, उन्हें भी अपना माना,
मर मर के जीने वालो के लिए, कभी आह क्यों न भरी,
रौंदा गया जब अमन का बाग, तब क्यों न चुप्पी तोड़ी,
कुछ अल्फाज़ों को तूफ़ान समझ,रास्ता अलग बनाया,
पीढ़ियों से झेले मैंने शब्दों के ज़ख्म, कभी पीछा छुड़ाया,
(सतीश गंगवार, ०५ मई २०१०)
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