Sunday, September 5, 2010

शुष्क धरती

पानी की एक बूंद ही काफी है,
शुष्क धरती की प्यास बुझाने को ,
प्यार भरी एक मुस्कराहट ही काफी है,
किसी की जिंदगी बसाने को,

पानी की एक बूंद ही काफी है,
जीवन मोती बनाती है सीप को,
उसे खुद को एक कण ही काफी है, 
मरे जो  हर पल धरा बचाने को,

जीते जो हर क्षण सडको पर नंगे भूखे, उनको,
दो जून की रोटी ही काफी है जिन्दा रहने को,
उनका तो एक पल जीना ही  काफी है!
हर पल मरते  हैं जो, औरों को जिन्दा रखने को,

एक 'चीर' ही काफी है, 
उजड़ रही है मानवता बचाने को, 

** सतीश गंगवार ** (१०-०३-२०१०)

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