Sunday, September 5, 2010

गाँव की यादें

मैं जितना भी आगे कदम रखता हूँ, मेरी जड़ें उतना ही पीछे खीच लेती हैं !
चला गाँव छोड़कर अकेला दोस्तोंवो पुरानी यादें अपनी ओर खीच लेती है !
चमकते शहर अच्छे लगते हैं, खेतो में पीली सरसों अपनी ओर खीच लेती है!
वो कलरव कहाँ अब यहाँ परिंदों का,बागों में चिडिओं की चहक पीछे खीच लेती है! 

जब भी चाहा बढ़ाना कदम,बचपन की यादें रास्ता रोक लेती हैं!
मुश्किल से आया हूँ यहाँ, माँ के हाथ की रोटियां मन खीच लेती हैं!
कोई छेड़ दे राग वहाँ का, तो रुनझुन रागिनी, बरबस पीछे खीच लेती है!
होली, दीवाली पर माँ के हाथ की गुजिया और कचौरी मन रौंद  देती है!

आपसी रंज हैं फिर भी वहां की नफासत, हरवक्त बाँहों मे भींच लेती है!
चलना तो पड़ेगा अकेले भी साथ भी, मिट्टी की सोंदी खुशबू खीच लेती है!
कंक्रीट के जंगलो रहता हूँ अब, कच्चे घरो की ठंडक अपनी ओर खीच लेती है! 
कुछ भी हों या न हों वहाँ, घर की दीवारों पर चीता-पोती मन खीच लेती है!

फसल के पकने का इंतज़ार और उसकी महक मेरा मन जीत लेती है!
ठंडी हवा, सुहानी भोरतालाब वो नदिया, मुझे अपनी ओर खीच लेती हैं! 
सबेरे सबेरे खेत पर गन्ने खाना याद है, उसकी याद मेरा मन तोड़ देती है!
दिनभर उछलना मछलना पेड़ो पर चढ़ना गिरना, वो यादें उधर दिल मोड़ देती हैं!
ठण्ड में अलाव, दादी की कहानियां, सांझ की मद्धिम रौशनी सब बोल देती है!
जैसा भी हो वहां का माहौल, बचपन की शरारतें बूढ़े को बच्चा बना देती हैं !
मैं जितना भी आगे कदम रखता हूँमेरी जड़ें उतना ही पीछे खीच लेती हैं !

चला गाँव छोड़कर अकेला दोस्तोंवो पुरानी यादें अपनी ओर खीच लेती है !

        ** सतीश गंगवार **

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