Sunday, September 5, 2010

कोख की आवाज़

कोख से जन्मी हैं दुनियां, मगर कोख में ही !
मर रही है मासूम और ममतामयी कोख धर्ता!
       हजारों कन्या भ्रूण काल के गाल में जाते हैं!
       हर रोज़ पढ़े और अनपढ़ों के हाथों से!
संसार में सबसे सुन्दर, ममत्व से भरी!
सृष्टि सृजन में जननी की है भूमिका!
       कब समझ पायेगे हम दर्द और महत्व!
       हर पल मरती उस मासूम कोख का!
नारी सृष्टि सृजन की  कर्ण धारिणी!
खुद के असितत्व को लडती आज भी!
       क्यों करुण चीख भी नहीं पड़ती है कानों में!
       जो जन्म से पहले ही  मरना नहीं चाहती!
  
** सतीश गंगवार **  (०१-०४-१०, समय- ११:३७ ए.एम.)

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