Sunday, September 5, 2010

अविरल

हर सीमा कि भी एक सीमा होती है,
पर एक सीमा से परे प्रेम प्रवाह,
सीमित को भी असीमित बना देता है,
ह्रदय में प्रेम स्फुटन ही,
दृढ़ता को लचीला बना देता है,
ह्रदय स्पंदन भी एक सीमा में होता है,
सब सीमाओं को पिघलाकर समा लेता है,
चक्षुओं की गहराई सांसों की गरमाई में,
सीमाओं का बंधन घुल जाता है,
प्रेमी शाश्वत न रहे फिर भी,
प्रेम की अविरल धारा असीमित छोड़ जाता है,
** सतीश गंगवार **

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