Sunday, September 5, 2010

बिना जड़ के दरख़्त

कोई खास मुक़ाम हो ज़म्हुरियत कादिल से न सोचा एक बार,
ख़ून से ख़ून लड़बा दियाहर क़त्ल पर हंसकर सांस ली हर बार,

          पुरानी चिंगारी को हवा देकरहर बार गरम किया सर्द दिलों को,
          ढाल लिए हैं फौलाद के घर में भीलड़ने भेज दिया है उनीदों को,

ख़ाक कर दिया  इंसानियत को जब चाहासजाने को अपना घर ,
इन्साफ को भी कठपुतली बनायासत्ता की गर्मी के नामपर,
         जीते हैं वो शान सेमरते रहे वो गरीबी,भुखमरी लिए जिन्दगी भर,
         क्या ख़ाक लड़ेंगे 'आदमीके लिएहर अलफ़ाज़ में है जिनके ज़हर,
बिना जड़ के दरख़्त कभी तो गिरेंगेबढने न दिया कभी औरों को,
'चन्द्रचलो मत करो आस उनसेझूठे ख्याब दिखाएहैं वतन को,


         ** सतीश गंगवार ** (०७ मई, २०१०)

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