कोई खास मुक़ाम हो ज़म्हुरियत का, दिल से न सोचा एक बार,
ख़ून से ख़ून लड़बा दिया, हर क़त्ल पर हंसकर सांस ली हर बार,
पुरानी चिंगारी को हवा देकर, हर बार गरम किया सर्द दिलों को,
ढाल लिए हैं फौलाद के घर में भी, लड़ने भेज दिया है उनीदों को,
ख़ाक कर दिया इंसानियत को जब चाहा, सजाने को अपना घर ,
इन्साफ को भी कठपुतली बनाया, सत्ता की गर्मी के नामपर,
जीते हैं वो शान से, मरते रहे वो गरीबी,भुखमरी लिए जिन्दगी भर,
क्या ख़ाक लड़ेंगे 'आदमी' के लिए, हर अलफ़ाज़ में है जिनके ज़हर,
बिना जड़ के दरख़्त कभी तो गिरेंगे, बढने न दिया कभी औरों को,
'चन्द्र' चलो मत करो आस उनसे, झूठे ख्याब दिखाएहैं वतन को,
** सतीश गंगवार ** (०७ मई, २०१०)
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