बात वो जो ख़ामोशी से बेहतर हो,
दिल को लग भी जाए पर ज़ख्म न हो,
निकल जाए कभी भी जुबाँ से तो,
फासलों का दर्द न फिर से जिन्दा हो,
लफ़्ज़ों में सूंघ ले दर्द के हर तूफां को,
बात जो न वीरानी हवा का नश्तर हो,
मत कहना कुछ तुम जिन्दा लाशों को,
मलमल से लकदक जिनका बिस्तर हो,
क्या समझेंगे भूख और मौत के बवंडर को,
दिलो-दिमाग पर पड़ा बेशर्मी का परदा हो,
ख़ामोशी की जुबान बहुत शोर मचा देती,
कभी तो यारो ये पत्थर भी पिघला देती,
इसका हुनर देखिये, कभी दोस्तों को रकीब,
और पल भर में, रकीबों को दोस्त बना लेती,
गरीबी की ख़ामोशी, कोई तपन नहीं देती,
उठती हूक उसकी, चट्टानों को हिला देती,
(सतीश गंगवार, १४-०६-१०)
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