सदियों से सजाती रही है औरत,
पुरुषों की दासता के ठप्पे,
मांग में सिन्दूर, पाँव में बिछुया,
और हाथों में चूड़ी रूपी ऐ बेड़ियाँ,
यही है शादी शुदा स्त्री की पहचान,
घर के बाहर या भीतर भी,
उसे ये बेड़ियाँ पहनकर ही घूमना है,
स्त्री को देखते अनायाश ही,
पुरुष क्यों ढूंढ़ता है स्त्री के,
हाथ, पैरों में बेड़ियाँ और मांग में सिन्दूर,
अगर ये सब है तो, शायद कुछ छोड़ दें घूरना,
ये सोचकर कि भोगी हुई वस्तु है,
किसी के खूंटे से बंधी हुई वस्तु है,
नहीं तो माल कि तरह पड़ती है उनकी नज़र,
ये हैं लड़की के शादी शुदा होने की मुहर,
पति के मरने के बाद उसे भी ,
सफ़ेद कफ़न में लपेटा जाता है,
एक और नयी पहचान देने के लिए ,
इन बेड़ियों में है उनकी आन बान शान ,
औरत ही है इन बेड़ियों को ढोने के लिए ?
खुद पे कोई मोहर नहीं लगाई ,
जिंदगी भर रहे स्वछन्द और ,
बाँध दिया औरतो को बेड़ियों में खूंटे से ,
पैरों में पायल, बिछुए, नाक में नाथ,
हाथों में चूड़ियाँ और मांग में सिन्दूर के लिए ,
क्या सिर्फ यही पहचान रह गयी है औरत की ?
कब दोगे उसे एक स्वतंत्र असितत्व ?
कब मानोगे आखिर वह भी, तुम्हारी तरह इंसान है ?
उसे भी तुम्हारी तरह, स्वतंत्रता से जीने का हक़ है ?
** सतीश गंगवार ** (२९-०४-१०, समय-८:०२)
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