Sunday, September 5, 2010

बिना पूंछ वाले

तासीर आदमी कीकि उसे देखकर आदमी ही डरने लगे ,
विश्वाश पी लिया, ईमान खा लिया, अब आदमी खाने लगे ,
सोच के बनाना रिश्ते, बिना पूंछ वाले प्राणी से अब डर लगे ,
महसूस करता हूँ कि मोगली कि तरह ही जाऊं जंगलों में .
और दोस्त बना लूँ भालू, हाथी और उछलते सह्रदय हिरने ,
यहाँ तो हैं अभी कुछ ही इंसान, ज्यादा हैं बिना पूंछ लगे ,
 ** सतीश गंगवार ** (समय-०१:०७, दिनांक-२४-०४-10)

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