उन्मुक्त हों उड़ू मैं, कोई न रोके मुझे,
आसमा से बातें करूँ, मेरा मन कहे जब मुझे,
अपनी सुगंध से अतिरेक करूँ मैं सारे नभ को,
स्वतंत्र आत्मा की पक्षी हूँ,
अबाधक अभिव्यक्ति ही पसंद है मुझे,
बन्धनों से परे प्रेम ढूंढ़ रही हूँ,
प्रेम सिखाया सभी ने पहले,
अब विरोध भी करते हैं सभी,
प्रेम मानव बनाता है हमें,
क्यूँ प्रताड़ित होते हैं प्रेमी,
प्रेम से सरावोर हूँ मैं,
किसको दूँ प्रेम, दुःख है मुझे,
प्रेम को सूली ने डराया,
फिर भी मिटा न पाया कोई इसे,
ईश पुकार है प्रेम करो,
सुनायी दे रही है मुझे,
(सतीश गंगवार)
Published in "Shreshtha Kavyamala, Khand-4" First Edition, By J.M.D. Publication, New Delhi. (2010, Page No.221)
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